Sadhana Shahi

Add To collaction

आज की युवा पीढ़ी (कहानी) प्रतियोगिता हेतु16-May-2024

आज की युवा पीढ़ी (कहानी) प्रतियोगिता हेतु

प्रशांत और रोहन दोनों के माता-पिता दोनों ही कॉरपोरेट सेक्टर में नौकरी करते थे अतः दोनों ज़्यादातर घर में अकेले रहते थे। रोहन के माता-पिता बड़े ही सख्त थे वो अपने जाने के बाद रोहन को घर से बाहर निकालने के लिए मना करके जाते थे। अतः रोहन शाम को बालकनी में कुर्सी लगाकर बैठकर खेलते हुए बच्चों को ललचाई हुई सी नज़रों से देखता रहता था।जबकि प्रशांत के माता-पिता उसे नैतिक- अनैतिक, अच्छी- बुरी बातें, उसकी जिम्मेदारियांँ, अपनी जिम्मेदारियाँ और मजबूरियांँ, उसका भविष्य किस प्रकार उज्जवल बन सकता है और कैसे गर्त में जा सकता है जैसी बातें बताना कभी भी नहीं भूलते। वो अपने व्यस्त दिनचर्या में भी समय निकालकर प्रशांत को प्रेरक कहानियांँ सुनाना नहीं भूलते। कहने का तात्पर्य है कि प्रशांत के माता-पिता नौकरी करते हुए भी प्रशांत के साथ समय बिताते थे, उसकी पसंद-नापसंद, ख़ुशी- नाराज़गी, आवश्यकताओं का ध्यान रखते थे जबकि रोहन के माता-पिता पैसे कमाने में इतने मशगूल हो गए थे कि वो रोहन के स्कूल के फ़ीस, कॉपियांँ- किताबें, कपड़े इत्यादि उसके ज़रूरत की चीजों को देकर ही अपने कर्तव्य की इति श्री समझ लेते।

दोनों बच्चे समय के साथ युवावस्था में प्रवेश किये प्रशांत जिसके ऊपर उसके माता-पिता का कोई दबाव नहीं था किंतु, सही- ग़लत की पहचान उसे थी। वह बाहर खेलने जाता, खेलकर आता ज़िम्मेदारी से अपने स्वयं के काम करता और घर के कामों में भी थोड़ा बहुत अपने माता-पिता की मदद करता, ऑफिस से आने पर उन्हें चाय- नाश्ता बनाकर देता है इस तरह उन तीनों का जीवन बड़ा ही सुखमय और ख़ुशहाल व्यतीत हो रहा था। कहने का तात्पर्य यह है कि तीनों को अपनी-अपनी जिम्मेदारियों का पूरा आभास था। यही कारण था कि परिवार में कभी भी क्लेश या द्वेष नहीं होता था।

जबकि रोहन बालकनी में चुपचाप बैठा रहता उसके दिमाग में तमाम तरह की खुराफाती बातें अंकुरित होतीं और पौधे के रूप में बड़ी होती जा रही थीं। एक दिन बालकनी के नीचे से सुशील नाम के एक बच्चे ने रोहन को हाथों के इशारे से नीचे बुलाया। रोहन जब नीचे गया तो सुशील ने कहा रोहन तुम अकेले ऊपर क्यों बैठे रहते हो? तब उसने बताया क्योंकि मेरे मम्मी- पापा बाहर निकलने के लिए मना करके जाते हैं। सुशील ने उसे बरगलाते हुए कहा अरे यार! यह मम्मी-पापा का तो काम होता है बच्चों को प्रेशर में रखना। तुम हमारे साथ चलो वहाँ बहुत मज़ा आएगा। वह रोहन को लेकर एक झोपड़ी में गया जहांँ पहले से ही चार-पांँच बच्चे मौजू़द थे। रोहन जब वहांँ पहुंँचा तो वहांँ के बच्चे और वहांँ का दृश्य उसके लिए विस्मित कर देने वाला था। सभी बच्चों के हाथ में नशीली चीज़ें थीं और ऐसा लग रहा था उस नशीली चीजों को लेकर वो सब जन्नत का सुख पा रहे हों।

सुशील रोहन के हाथ में भी एक ग्लास थमाते हुए बोला इसको एक बार हलक के नीचे उतार कर देखो सारी परेशानियांँ, सारा डिप्रेशन दूर हो जाएगा। तुम स्वर्ग की सैर करोगे रोहन । रोहन' ने कहा नहीं-नहीं यह तो बहुत ग़लत चीज़ है मैं इसे नहीं ले सकता। यदि मेरे मम्मी- पापा को पता चल गया तो वो बहुत नाराज़ होंगे।

सुशील ने कहा अरे यार! लेकर तो देखो जब तक तुम्हारे मम्मी पापा आएंँगे तब तक इसका असर भी ख़त्म हो जाएगा। रोहन भी पहली बार कैद से आज़ाद हुआ था अतः बहुत देर तक सुशील की बात को टाल नहीं सका और उसने एक पैक शराब पी लिया। यह उसका पहला दिन था। उसके बाद सुशील उसे घर छोड़ आया अब सुशील और रोहन की यह दैनिक दिनचर्या हो गई जब रोहन के माता-पिता घर आते तो रोहन हमेशा घर में मिलता रोहन के माता-पिता को रोहन के बारे में जरा भी भनक नहीं थी। वो हमेशा प्रशांत के माता-पिता से प्रशांत की शिकायत करते कि आपके नहीं रहने पर आपका बच्चा घूमता रहता है,आवारा लड़कों के साथ खेलता है लेकिन प्रशांत के माता-पिता को अपने परवरिश और अपने बच्चे पर पूरा भरोसा था उन्हें इस बात का विश्वास था कि उनका बच्चा कभी भी किसी ग़लत संगत में नहीं पड़ सकता है‌ अतः वे रोहन के माता-पिता के बातों को सुन तो लेते किंतु उसको बहुत गंभीरता से नहीं लेते थे। जबकि रोहन के माता-पिता अपने ही बच्चे को नहीं जान पाए थे।

देखते-देखते रोहन और प्रशांत दोनों 12वीं पास कर स्नातक में पहुंँच गये। प्रशांत प्रौद्योगिकी में स्नातक करने हेतु मुंबई चला गया। जबकि रोहन अपने माता-पिता के सख़्त और छोटी सोच के कारण वहीं पास के विद्यालय में स्नातक करने लगा‌ अब उसके मित्रता का दायरा और भी बड़ा हो गया। अब वह कभी-कभी घर से चोरी भी करने लगा। पहले-पहल जब घर से पैसे गायब हुए तो रोहन के माता-पिता को घर में काम करने आने वाली बाई पर शक हुआ अतः उन्होंने बाई बदल दिया। किंतु उसके बाद भी पैसे गायब होते रहे तब रोहन के पिता ने एक दिन उसकी मांँ से बोला देखो मनु, हम लोगों ने कामवाली को बदल दिया लेकिन पैसे चोरी होने का सिलसिला नहीं खत्म हुआ हमें लग रहा है कहीं ऐसा तो नहीं कि पैसे रोहन चोरी कर रहा है रोहन की मांँ उसके पति के मुंँह से अपने बच्चे के बारे में इस तरह की बात सुनकर आग बबूला हो गई। उसने कहा आखिर हमारे बच्चे को किस चीज़ की कमी है जिसके लिए वह चोरी करेगा? हर कुछ तो हम लोग उसके लिए भरे रहते हैं। उसकी ज़रूरत से अधिक चीजे़ उसके पास हैं फिर भला आप ही बताइए वह किस लिए चोरी करेगा और इसके अलावा वह कहीं भी आता- जाता भी तो नहीं है तो पैसे वह क्यों लेगा? उसने कहा आप ऐसे कैसे मेरे बेटे पर लांछन लगा सकते हैं? रोहन के पिता ने कहा रोहन सिर्फ़ तुम्हारा ही नहीं मेरा भी बेटा है और मैं लांछन नहीं लग रहा हूंँ लेकिन मुझे ऐसा लग रहा है इसलिए हमें रोहन को बिना बताए यह कौन कर रहा है इसका पता लगाना चाहिए। क्योंकि आज की युवा पीढ़ी बहुत जल्द रास्ते से भटककर ग़लत रास्ते पर चली जा रही है।रोहन के पिता की बात सुनकर उसकी मांँ नाराजगी दिखाते हुए बोली ठीक है कर लीजिए अपनी तसल्ली।

एक दिन अवकाश के दिन रोहन के माता-पिता ने रोहन को कहीं दूर किसी काम के बहाने भेज दिया और इस बीच उन्होंने घर में एक ख़ुफ़िया कैमरा लगवा दिया उस कमरे से अनजान रोहन जिस तरह से पैसे चोरी करके दोस्तों के साथ गुलछर्रे उड़ाता था उड़ाता रहा और उसकी सारी काली करतूतें कैमरे में कैद होती रहीं जब रोहन के माता-पिता को पैसे चोरी का आभास हुआ तो उन्होंने कैमरा खोलकर देखा और उसके बाद उन्होंने जो देखा उसे देखकर उनके पैरों तले की ज़मीन खिसक गई। जबकि दूसरी तरफ़ प्रशांत अपने अध्ययन- अध्यापन में तल्लीन सुनहरे भविष्य की तरफ़ अग्रसर था।

दोस्तों माता-पिता दोनों का नौकरी करना आज की आवश्यकता बन गई है। लेकिन इस आवश्यकता की पूर्ति में हमारा जो मुख्य कर्तव्य है अपने बच्चों को सही दिशा और दशा देना हम उसको भूलते जा रहे हैं। और यदि हम अपने मुख्य कर्तव्य को ही भूलते जा रहे हैं तो हमारे पैसे कमाने का कोई फ़ायदा नहीं है। क्योंकि हम जिसके लिए दिन- रात एक कर रहे हैं वही ग़लत रास्ते पर चला जाता है तो वो पैसे किस काम के हैं!

अतः हमें चाहिए कि हम कितने भी व्यस्त हों हम अपने व्यस्त दिनचर्या में भी अपने बच्चों के लिए घंटा- आधा घंटा का समय निकालें उन्हें अच्छे-बुरे की पहचान बताएंँ, उनकी पसंद- नापसंद उनके मित्र , उनका विद्यालयी परिवेश, शिक्षक आदि के साथ उसके संबंधों के बारे में जाने।

कुल मिलाकर कहने का तात्पर्य यही है कि हम चाहे जितने भी व्यस्त हो किंतु उस व्यस्तता में भी हम अपने बच्चों के साथ समय बिताना कभी नहीं भूलें। अन्यथा हमें अपने बच्चों को खोते देर नहीं लगेगी। क्योंकि, आज की युवा पीढ़ी बहुत ही संवेदनशील हो गई है, वह बहुत जल्द अवसादग्रसित हो जाती है और अवसादग्रसित होने के पश्चात वो कब अनचाहे ग़लत रास्ते पर चली जा रही है इसका आभास उनको स्वयं को भी नहीं होता है। और जब तक आभास होता है तब तक सब कुछ उनके हाथ से निकल गया होता है, अगर उनके पास कुछ होता है तो उनका अंधकारमय भविष्य।

साधना शाही, वाराणसी

   0
0 Comments